Alimony वह रकम है जो अदालत एक जीवनसाथी को दूसरे को देने का आदेश देती है, ताकि जो अपना ख़र्च नहीं चला सकता उसे सहारा मिले। केस के दौरान इसे अंतरिम गुजारा भत्ता और तलाक़ के समय स्थायी alimony कहते हैं। रकम का कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है; दोनों की आमदनी, ज़रूरत और हालात देखे जाते हैं।
मुख्य बातें
- गुजारा भत्ता केस के दौरान या शादी में मिलता है, alimony आम तौर पर तलाक़ पर।
- Alimony हर तलाक़ में ज़रूरी नहीं, यह ज़रूरत और क्षमता पर निर्भर है।
- Rajnesh v. Neha (2020) के बाद दोनों पक्षों को अपनी आमदनी का हलफ़नामा देना होता है।
- Hindu Marriage Act में पति भी alimony माँग सकता है।
- पैसे न मिलें तो अदालत warrant और जेल तक का आदेश दे सकती है।
Alimony kya hota hai: सीधा जवाब
Alimony का मतलब है वह आर्थिक सहायता जो तलाक़ के समय या उसके बाद अदालत एक जीवनसाथी को दूसरे को दिलवाती है। हिंदी में इसे आम तौर पर गुजारा भत्ता या भरण-पोषण कहा जाता है। इसका मक़सद यह है कि शादी टूटने के बाद कोई भी पक्ष, ख़ासकर वह जिसकी अपनी आमदनी नहीं है, बेसहारा न रह जाए।
यह रकम हर महीने भी दी जा सकती है और एक साथ (lump sum) भी। कई बार mutual consent divorce में दोनों पक्ष आपस में तय कर लेते हैं कि एक बार में कितनी रकम दी जाएगी। अंग्रेज़ी में इसी विषय पर ज़्यादा विस्तार से हमारी गाइड alimony और maintenance कैसे तय होते हैं पढ़ सकते हैं।
Alimony और गुजारा भत्ता में क्या फ़र्क है?
लोग दोनों शब्दों को एक जैसा इस्तेमाल करते हैं, पर कानून में समय के हिसाब से फ़र्क है:
| प्रकार | कब मिलता है | कानून |
|---|---|---|
| गुजारा भत्ता (maintenance) | शादी चलते हुए, जब पति साथ न रखे या ख़र्च न दे | BNSS धारा 144 (पहले CrPC 125), HAMA धारा 18 |
| अंतरिम गुजारा भत्ता (interim) | तलाक़ या दूसरा केस चलने के दौरान, केस का ख़र्च भी | Hindu Marriage Act धारा 24 |
| स्थायी alimony (permanent) | तलाक़ के आदेश के समय या बाद में | Hindu Marriage Act धारा 25, Special Marriage Act धारा 37 |
| आर्थिक राहत (monetary relief) | घरेलू हिंसा के मामले में | Domestic Violence Act, 2005 धारा 20 |
एक से ज़्यादा कानून में केस किया जा सकता है, लेकिन अदालत एक रकम को दूसरी में समायोजित करती है ताकि एक ही ज़रूरत का दो बार भुगतान न हो।
Alimony kanoon kya hai? कौन माँग सकता है?
- पत्नी: BNSS धारा 144 के तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता गुजारा भत्ता माँग सकते हैं। यहाँ 'पत्नी' में वह तलाक़शुदा महिला भी शामिल है जिसने दोबारा शादी नहीं की।
- पति: Hindu Marriage Act की धारा 24 और 25 gender neutral हैं। अगर पति की अपनी पर्याप्त आमदनी नहीं है, जैसे बीमारी या विकलांगता के कारण, तो वह भी माँग सकता है। BNSS 144 में पति को यह हक़ नहीं है।
- मुस्लिम महिला: सुप्रीम कोर्ट ने Mohd. Abdul Samad v. State of Telangana (2024) में कहा कि तलाक़शुदा मुस्लिम महिला भी CrPC 125 (अब BNSS 144) के तहत दावा कर सकती है।
- बच्चे: बच्चों का ख़र्च अलग से तय होता है और माता-पिता के झगड़े से उस पर असर नहीं पड़ना चाहिए।
BNSS 144 के तहत वह पत्नी हक़दार नहीं होती जो 'living in adultery' है, बिना ठोस कारण पति के साथ रहने से मना करती है, या आपसी सहमति से अलग रह रही है। Affair का असर विस्तार से adultery और alimony वाली गाइड में समझाया गया है।
Kya alimony dena jaruri hai?
नहीं, हर तलाक़ में alimony अपने आप नहीं मिलती। अदालत दो बातें देखती है: क्या माँगने वाले को सच में ज़रूरत है, और क्या देने वाले की क्षमता है। अगर पत्नी अच्छी नौकरी करती है और पति के बराबर कमाती है, तो उसे अपने लिए शायद कुछ न मिले, हालाँकि बच्चों का ख़र्च फिर भी तय हो सकता है।
दूसरी तरफ़, जिस पति को अदालत ने भत्ता देने का आदेश दे दिया है, उसके लिए भुगतान करना ज़रूरी है। 'मेरी नौकरी चली गई' कहकर ख़ुद से पैसे रोक देना ग़लत है; रकम बदलवाने के लिए अदालत में आवेदन देना पड़ता है।
Alimony case kya hota hai और कैसे चलता है?
- वकील से सलाह लें कि कौन-सा कानून आपके लिए सही है। ख़र्च की चिंता हो तो District Legal Services Authority से मुफ़्त वकील मिल सकता है, helpline 15100।
- आवेदन दायर करें जिसमें अपनी ज़रूरतें, बच्चों का ख़र्च और पति या पत्नी की आमदनी की जानकारी हो।
- संपत्ति और आमदनी का हलफ़नामा दें। Rajnesh v. Neha (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने हर maintenance केस में दोनों पक्षों के लिए यह affidavit ज़रूरी किया।
- अंतरिम भत्ता माँगें। BNSS 144 के अनुसार अंतरिम भत्ते पर, जहाँ तक हो सके, notice के 60 दिन में फ़ैसला होना चाहिए।
- सबूत और बहस के बाद अदालत अंतिम आदेश देती है। आम तौर पर भत्ता आवेदन की तारीख़ से लागू होता है।
तलाक़ के ख़र्च और मुफ़्त कानूनी सहायता के बारे में हमारी गाइड divorce cost और lawyer fees देखें।
Alimony की रकम कैसे तय होती है?
कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है। अदालत ये बातें देखती है:
- दोनों पक्षों की आमदनी, संपत्ति और कर्ज़;
- शादी में रहन-सहन का स्तर;
- पत्नी और बच्चों की उचित ज़रूरतें, पढ़ाई और इलाज;
- माँगने वाले की पढ़ाई, नौकरी की क्षमता, और परिवार के लिए छोड़ा गया करियर;
- देने वाले पर निर्भर दूसरे लोग, जैसे बूढ़े माता-पिता;
- शादी कितने साल चली।
सुप्रीम कोर्ट ने Kalyan Dey Chowdhury (2017) में कहा था कि पति की net salary का लगभग 25% उचित हो सकता है। इसे अदालतें एक संकेत मानती हैं, पक्का नियम नहीं। Anju Garg (2022) में कोर्ट ने कहा कि सक्षम पति को परिवार के लिए कमाना ही होगा, इसलिए नौकरी छोड़ देने से ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं होती।
पति या पत्नी की असली कमाई कैसे साबित करें?
ज़्यादातर झगड़ा इसी पर होता है। कोई salary कम बताता है, कोई business को घाटे में दिखाता है, कोई संपत्ति रिश्तेदारों के नाम कर देता है। कानूनी रास्ते ये हैं:
- अदालत से salary slip, Form 16, income tax return और bank statement मँगवाने का आवेदन;
- employer को गवाह के रूप में बुलाना;
- MCA और GST पोर्टल पर company और business की सार्वजनिक जानकारी;
- गाड़ियाँ, किराया, विदेश यात्रा जैसे रहन-सहन के सबूत।
Bank details, call records या किसी का email ख़ुद निकलवाना गैरकानूनी है, और ऐसा करने वाला कोई भी 'detective' आपको मुसीबत में डाल सकता है। एक verified detective सिर्फ़ सार्वजनिक रिकॉर्ड और खुली जगहों पर निगरानी से lifestyle और business की जानकारी जुटा सकता है, जैसा asset tracing में बताया गया है। Hire Your Detective पर भरोसेमंद private jasoos मिल सकते हैं जो आपके वकील के साथ मिलकर काम करें।
निष्कर्ष
Alimony कोई इनाम या सज़ा नहीं, बल्कि ज़रूरत पर आधारित हक़ है। सही कानून चुनें, अपनी आमदनी का सच्चा हलफ़नामा दें, अंतरिम भत्ता जल्दी माँगें और दूसरे पक्ष की असली कमाई के कानूनी सबूत जुटाएँ। घरेलू हिंसा या ख़तरे की स्थिति में तुरंत 112 या महिला helpline 181 पर संपर्क करें।
स्रोत
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। अपने मामले के लिए किसी वकील से सलाह लें। आपात स्थिति में 112 पर कॉल करें।